इतिहास के दुकानदार और किसान इतिहास

 

 विकाश आनन्द।

इतिहास के दुकानदारों की दुकानदारी देखिये कि कितना जतन करके किसानों के इतिहास को चर्चा से ही गायब कर दिया गया है। जिस मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को तराइन के दूसरे युद्ध में पराजित किया, मार्च 1205 में उसी गौरी का सर खोखर जाटों ने रामलाल खोखर के नेतृत्व में काट दिया था। इसके बावजूद इतिहास की दुकान से उनका नाम गायब है।

सोमनाथ मंदिर लूटकर जा रहे महमूद गजनवी को नागौर में खोखरों ने लूट लिया। लेकिन इतिहास लिखने वालों ने इसे भी दर्ज़ करने लायक नहीं समझा।

दिल्ली लूटकर वापस जाते समय सर्वखाप पंचायत ने भटिंडा के पास तैमूर लंग की भी जमकर पिटाई की थी और उससे काफ़ी सामान लूट लिया था। यह भी दुकानदारी में बिकने लायक़ सामान नहीं है शायद।

इन अजेय और स्वाभिमानी योद्धाओं के नाम तक हमारे इतिहास के दुकानदारों को पता नहीं हैं। स्वामिभक्ति की पराकाष्ठा देखिये कि जब उल्लेख बहुत करना जरुरी हो गया तो लुटेरे, अपराधी जैसे नीच विशेषणों से नवाज़ कर इतिश्री कर लिया। वही लोग भारत की लोकतंत्री सरकारों के मुखियाओं को कभी लुटेरे और अपराधी नहीं कह पाते हैं।

अब इतिहास को रिक्रिएट करके हिसंक मनोवृत्ति को हिंदुस्तान का स्थाई भाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पृथ्वीराज चौहान और राणा प्रताप को हिंदुत्व का प्रतीक बनाया जा रहा है (क्योंकि राम के दिन लद गए हैं और परशुराम की कहानी को समावेशी बनाया नही जा सका)। स्मरण रहे कि, इनके पास इन दोनों से श्रेष्ठ फ़िलहाल कोई और कल्पना नहीं है। ये दोनों ही अपनी लड़ाइयों में मात खाये हुए हीरो हैं। किसान समुदाय के वीरों का इतिहास में जिक्र तक नही है।

किसान जाति की नई पीढ़ी अपने इतिहास को जानने के बजाय इस कोरी बकवास को सच मान ले रही है। समस्या उन ठाकुरों के साथ है जिनका पेशा किसानी रहा है, लेकिन सिनेमाई प्रभाव में अपनी ज़मीन, अपना सम्मान और अपनी न्यायप्रियता सब खोकर इस हिंसक हिंदुत्व के सबसे बड़े खेवहनहार बने हुए हैं।

हमारे यहाँ अमतौर पर वीरता के निर्धारण की कसौटी बहुत गन्दी किस्म की है, लड़ने वाले सिपाही और उसकी वीरता की जहाँ कोई कदर नहीं है। हम द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में स्तालिनग्राद में उस चरवाहा सैनिक के बारे में जानते हैं, जिसने अपने अचूक निशाने से पचासों जर्मन सैन्य अधिकारियों की खोपड़ी खोली थी। हम टॉम पेन और जॉर्ज वाशिंगटन का नाम के उन साथियों का नाम भी जानते हैं, जिन्होंने उन्हें बनाया। लेकिन अपनी अतीत की बहादुरी पर गर्व करके अपनी वर्तमान ख़स्ता हालत को ढांपने का असफ़ल प्रयास करने वाले हम बहुत मुश्किल से राणा पुंजा और भामाशाह को जान पाते हैं। हमें अपनी इस नायक निर्माण की मशीनरी को भी री-सेट करने की बहुत जरुरत है।

अब देखिये कि इस तरह की दुकानदारी से किसको लाभ है और किसको सबसे ज़्यादा नुक़सान। सब कारस्तानी समझ में आ जाएगी।

Related posts

Leave a Comment